Saturday, 4 October 2014

"विगत तिमिर स्‍वप्नों  में खोयी"



विगत तिमिर में स्‍वप्नों  खोयी
        अवनि का अंचल जाग उठा.
नोर, संवर प्राची-अतिथि रथ,
       भोर ले, कलगान उठा।


दर्शनी-से नीर-कण तब,
       मोतियों-से भाने लगे,
कुरंग-गति-से, हंस-कुल,
       उतर नभ से आने लगे।

 
माधवी-मद-गंध लाई,
        आकृष्‍ट कर अलि-वृंद को,
 रत-मधुप फिर उठ ना पाते,
        पान कर मकरंद को।


मौलिक रचना-अभिजित कर

  १८.१०.७१