"विगत तिमिर स्वप्नों में खोयी"
विगत तिमिर में स्वप्नों खोयी
अवनि का अंचल जाग उठा.
नोर, संवर प्राची-अतिथि रथ,
भोर ले, कलगान उठा।
दर्शनी-से नीर-कण तब,
मोतियों-से भाने लगे,
कुरंग-गति-से, हंस-कुल,
उतर नभ से आने लगे।
माधवी-मद-गंध लाई,
आकृष्ट कर अलि-वृंद को,
रत-मधुप फिर उठ ना पाते,
पान कर मकरंद को।
मौलिक रचना-अभिजित कर
१८.१०.७१
विगत तिमिर में स्वप्नों खोयी
अवनि का अंचल जाग उठा.
नोर, संवर प्राची-अतिथि रथ,
भोर ले, कलगान उठा।
दर्शनी-से नीर-कण तब,
मोतियों-से भाने लगे,
कुरंग-गति-से, हंस-कुल,
उतर नभ से आने लगे।
माधवी-मद-गंध लाई,
आकृष्ट कर अलि-वृंद को,
रत-मधुप फिर उठ ना पाते,
पान कर मकरंद को।
मौलिक रचना-अभिजित कर
१८.१०.७१
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